ش | ی | د | س | چ | پ | ج |
1 | ||||||
2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 |
9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 |
16 | 17 | 18 | 19 | 20 | 21 | 22 |
23 | 24 | 25 | 26 | 27 | 28 | 29 |
30 | 31 |
مستی اش چشم و دل و هوش مرا
شب مهتاب گرفت
باید آغوش تو را قاب گرفت
مرگ روزی خراب خواهد کرد
راه دلخواه زندگانی را
سقف کوتاه زندگانی را
دنیا پر از کفتار و مار و شیر و گرگ است
در بین اینها من چه هستم؟
آه! این معمّایی بزرگ است
ای کسی که قلب من سرشار از امّید تو است
تو کجا هستی که جان عاشقم
تشنه آغوش خورشید تو است